जीवन में जब चाह बढ़ जाती है और फिर आपपर किसी किस्म का दबाव भी बनने लगता है तो वो परिस्तिथियाँ थोड़ी निराशा लाती हैं . हम हताश होते हैं, करना कुछ और चाहते हैं करते कुछ और हैं . जीवन इस दोराहे पर आके जाने क्यूँ भटक सा जाता है . वर्त्तमान में कुछ ऐसी ही स्थितियों से जूझ रहा हूँ और एकदम अनजान हूँ अपने आने वाले भविष्य को लेकर . पढना मेरा पुराना शौक रहा है, मगर एक चाह भी रही है की नौकरी करूँ और परिवार को सम्भालूँ, दोनों चीजें हो सकती हैं, मगर एक तीसरी चीज की चाह ने समीकरण को थोडा डांवाडोल कर दिया है फिलहाल तो . इस जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय के परिसर में आकर भी मैं यहाँ की सुविधाओं का वो इस्तेमाल नहीं कर पा रहा हूँ जैसा मैंने सोचा था .हालांकि यहाँ आकर मेरे सामने कई द्वन्द भी आये . भारतीय प्रशासनिक सेवा की तैयारी के उद्देश्य से यहाँ आया था मगर फिर लगा जैसे इन चीजों से ज्यादा बड़ा आपका अपना ज्ञान है जो यहाँ के REsources की मदद से मुझे मिल सकता है और फिर मेरे लिए वाकई प्रशासनिक सेवा का कोई ख़ास महत्व नहीं रह जाएगा . मगर पारिवारिक जिम्मेदारियों से भी मुह नहीं मोड़ा जा सकता और इंजीनियरिंग के समय का लोन भी चुकाना है, ऐसे में क्या करूँ यही इस दुविधा का विषय है . जिस माहौल में अभी रह रहा हूँ वहां होते हुए भी नहीं हूँ शायद और फिर ऐसे में एक और निराशा की मैं वाकई क्या कर रहा हूँ,?? ये बैंकिंग और सचिवालय की नौकरी क्या वाकई मेरे ज्ञान के चाह को बचा पाएगी, या फिर 9 से 5 की नौकरी में मेरा अपना वजूद कहीं खो न जाए . समाज सेवा का जो लक्ष्य मैंने एक लम्बी सोच के लिए सोच रखा है, उसके लिए भी क्या करूँ, ये समझ नहीं आता . पिछले कुछ दिनों से वाकई बहुत मानसिक दुविधा है, जीवन ऐसा भी हो जाएगा, ये नहीं सोचा था, फिर करूँ तो क्या ?????
JNU: Vaartaa
Sunday, 6 April 2014
Wednesday, 25 December 2013
आम आदमी-नयी लड़ाई
दिल्ली की सड़कों पर रौनक लौट आयी। दिन का सूरज कुछ ज्यादा ही तेज़ था। भाजपाई Frustation जायज है। पिछले कई सालों विपक्ष में बैठकर तो कुछ हुआ नहीं,और इस बार "लहरी बाबा " का थोडा बहुत असर (जो कि दिल्ली में कतई नहीं रहा ) महसूस किया,उसके दम पर "आम आदमी पार्टी के उठाये मुद्दों की विरासत " पर उसने "सत्ता" पाने जो ख्वाब देखा,तो उसी आम आदमी ने उसे दरकिनार करते हुए अपनी सेवा खुद ही करने का विकल्प चुना। लोग कह रहे हैं कि भाजपा ने ३२ सीटों के बाद भी सत्ता हासिल नहीं की और वो इसे उसका बड़प्पन बताते हैं,और वही लोग आम आदमी के पार्टी बना लेने पर बयानबाजी कर रहे हैं। दो मुख्य सवाल हैं- क्या ये उनके लिए शर्म कि बात नहीं कि 15 साल से विपक्ष में बैठकर और उसके 15 साल पहले से राजनीति में आकर आप बहुमत भी नहीं बना पाये। जबकि आम आदमी पार्टी ने एक साल के इस समय में 28 सीटों पर अपना दावा दिखाया। अगर यही जनता का फैसला है,तो इस फैसले के पीछे का इतिहास भी देखिये। 32,28 से ज्यादा ही है,मगर सच्चाई से तो आप भी वाकिफ हैं ना।
दूसरी बात-अगर आप जनता के इतने बड़े हिमायती रहे तो अल्पमत में सरकार बनाने का दावा पेश क्यूँ नहीं किया। आप दावा पेश करते,फिर अगर कोई आपके विरोध में जाता तो वो सही मायनो में जनता के कोप का कारण बनने लायक होता। मगर आप इस उम्मीद में रहे कि जिम्मेदारी क्यूँ लें? कमियां निकालना आसान लगा भाजपाइयों को। फिर आपने "आप " पर दबाव बनाया कि वो जिम्मेदारी से भाग रही है,और जब लोकतंत्र में पहली बार "आप" ने जनमत संग्रह से फैसला लेने का ऐतिहासिक कदम उठाया तो आपको वो भी नौटंकी लगा। समस्या शायद यही है-कई सालों से ओछी राजनीती करते करते आपने दोनों को पर्याय मान लिया इसीलिए असली लोकतंत्र आपके लिए सिर्फ किताबी बातें और ज्ञान रहा।
कांग्रेस के साथ "AAP" का गठबंधन नहीं हुआ है,ये सिर्फ मुद्दों को लेकर एक समर्थन है,और जिस शर्त की बात शीला दीक्षित ने की वो तो हर दिल्लीवासी चाहता है। वैसे भाजपा का गठबंधन को लेकर इतिहास भी कुछ बहुत अच्छा नहीं रहा है,भली-भाँती समझ रहे होंगे आप सब। कुछ लोग तो "लहरी बाबा" के फेर में ऐसा पड़ गए हैं कि उनको उनमे भगवान् विष्णु का दसवां अवतार दिखने लगा है. जनता फिर भी धैर्य धरे है,वो इसलिए क्योकि जनता की ही तो सरकार बनने जा रही है . लोग इसे अपने-अपने तरह से विश्लेषित भी कर रहे हैं. अब क्या करें,हर तरह का जोड़-तोड़ भी ज़रूरी है. साहित्य की एक बड़ी विशेषता है-चीजों को जैसा चाहो,वैसा दिखा दो,बस शब्दों के हेर-फेर से। वैसे भी बचपन की कहावत है-बात और हल्दी कहीं भी लग जाते हैं.
खैर अब आगे की बात- राजनीतिक घोषणापत्र को पूरा करने के लिए पूरे 5 साल दिए जाते हैं,मगर भाजपा तो उत्तेजना के चरम पर जाकर चाह रही है कि सभी काम 5 दिन में हों। इसी उत्तेजना में सामजिक समझ भी ख़तम कर ली क्या? कुछ लोग तो इस कदर कुतर्क कर रहे हैं कि केजरीवाल के आने से काम के घंटे 6 7 तो होंगे नहीं, हद है यार। अब कहो तो केजरीवाल आपके बच्चों कि देखभाल भी कर लें। केजरीवाल हॉग्वर्ट्ज़ स्कूल के हैरी पॉटर तो नहीं न,जो झाड़ू पर उड़कर,छड़ी घुमाकर सारा देश बदल दें,मगर हाँ-जिस लोकतंत्र को सुचारु रूप से क्रियान्वित करने ख्वाब आम आदमी ने देखा,वो देश की ज़रुरत है।
काम तो हमारे देश में अभी "प्रथम पंचवर्षीय योजना " का भी पूरा नहीं हो पाया,उसका क्या? फिर सारा आरोप-प्रत्यारोप AAP पर ही क्यूँ? बिजली के दाम अगर २०-३० % भी कम हुए तो क्या ये उपलब्धि नहीं। और फिर उनसे पूछिए जो 30% का बोलकर भी आने में डर गए। योजनाओं का असर दिखने में समय लगता है,बस समय कि प्रतीक्षा कीजिये। वैसे भी दिल्ली में पिछले एक साल में कितना कुछ तो बदल गया है।
"आम आदमी " सोशल नेटवर्किंग पर भाड़े के टट्टू बिठाकर दिन भर अपना प्रचार तो नहीं करता मगर कभी कभी कुछ लोगों को जवाब देने का मन कर ही जाता है। और फिर समय और जनता से बलवान कोई नहीं-मौक़ा आने दीजिये, बस एक बटन दबाकर वो आइना दिखायेगी। ………
Tuesday, 17 December 2013
निर्भया तुम्हे सलाम...
पूरे एक साल हो गए,इस सोते हुए समाज को एकाएक जगा देने वाली घटना को। एक साल पहले ऐसे ही एक सुबह जब पेपर में ये घटना पढ़ी तो ना जाने क्यूँ वो लिखे शब्द संवेदनाओं के सबसे अंदरूनी स्तर को छू गये। सब कुछ इतना अमानवीय,इतना क्रूर। कुछ तो था उस दिन उस समाचार में, जो बार बार मेरे रोंगटे खड़े कर दे रहा था। दोपहर से शाम होते-२ जब सीनियर्स और जूनियर्स से बातें हुई तब एहसास हुआ कि इस क्रूरता पर प्रतिक्रिया हर जगह एक जैसी थी। उस समय, उस सम्बन्ध में ज्यादा कुछ नहीं लिखा था। विचार शून्य थे और भावनाएं प्रबल थीं मगर इतना तो था कि उस घटना ने इस सो चुके तथाकथित सभ्य समाज की क्षीण हो चुकी इंसानियत को उजागर कर दिया। आज एक साल बाद जब इस JNU में आकर चीजों को समझ पाने कि क्षमता पहले से बढ़ी है, तब कहीं न कहीं इन होती आ रही घटनाओं का मूल नज़र आता है।
सोचता हूँ उस माँ के बारे में,उस पिता के बारे में जो 16 दिसंबर आते ही शायद अजीब सी बेचैनी महसूस करने लगते होंगे। हंसना-रोना,सुख-दुःख,सब कुछ उनके लिए एकदम अजीब,जैसे हर किसी चीज से परे सब भावनाएं। मुझे लगता है,जैसे वो इस तारीख को अपनी ज़िन्दगी से हटा देना चाहते होंगे। 15 के बाद 17 दिसंबर, साल के 364 दिन, शायद यही होगी शेष ख्वाहिश।
वो मशाल जो ठीक एक साल पहले,इन्ही दिल्ली कि गलियों से,सड़कों से होकर देश के कोने कोने में जली, जिसके लिए लोग बड़ी संख्या में लड़े,वो कितना बदलाव लायी, ये अहम सवाल है। मैंने गौर किया कि जनवरी 2013 से पेपरों में रेप, बलात्कार,यौन-शोषण,छींटाकशी के केस एक बड़ी संख्या में ज़ाहिर हुए हैं जो हाल ही के आसाराम, तरुण तेजपाल और भारत के पूर्व सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश की करतूतों तक जारी है। कहने का अर्थ है-कि ये घटनाएं पहली भी होती थीं,मगर अब ज़ाहिर होने लगी हैं। लोगों में लड़ने का हौसला जगा है अब। "समाज में बदनामी हॊगी " जैसे छद्म विचारों से ऊपर आकर आवाज़ उठाने कि ताकत आयी है। कुकर्मी छोटे से छोटा हो,या बड़े से बड़ा अब मायने नहीं रख रहे हैं। निर्भया जंग कि शायद यही सबसे बड़ी जीत है। मगर इस लड़ाई को बढ़ाने की ज़रुरत है,सामाजिक समानता सिर्फ कलमों और लेखों तक सीमित रखे जाने वाले शब्द नहीं . पितृ-सत्तात्मकता,अन्याय,सामाजिक बंधन-इन्हे मिटाने की ज़रुरत है। समय लगेगा,मगर हार नहीं माननी है,बदलाव धीरे ही सही-आना चाहिए,सही अर्थों में वही जीत होगी। खुद अच्छे बने रहना एकमात्र विकल्प नहीं,गलत को सुधारना भी होगा। निर्भया तुम जहाँ कहीं भी होगी,इस बदलाव को देखकर शायद अपनी कुर्बानी को ज़ाया ना जाते देख खुश होगी।
तुम्हारे हर एक जज़बे को सलाम।
नारी-मुक्ति ज़िंदाबाद
निर्भया अमर रहे................
Thursday, 8 August 2013
एक सपना जो सच हुआ
मई में 15 तारीख के बाद हमारे यूनिवर्सिटी परीक्षाओं का समय आ ही जाता है। हमारी भी परीक्षाएं उसी समय आरम्भ हुई थी। इन्ही सबके बीच मुझे देना था उस विश्वविद्यालय की प्रवेश परीक्षा जो मेरे लिए किसी सपने से कम नहीं थी। खैर, पेपर दिया,वापस आकर काफी कुछ समय बीता,अपने पुराने दोस्तों की बिछडन का ढेर सारा दुःख लेकर घर गए। आने वाले समय में क्या करना है,ये विचारों की चर्चा में प्रमुख विषय रहता था, ज़िन्दगी उस मोड़ पर थी जहाँ मैंने अपने लिए वाकई कोई विकल्प नहीं रखा था। UPSC में जाना ही एकमात्र सपना था जो,जानता था मैं,की इतनी जल्दी पूरा नहीं होने वाला है, प्राइवेट नौकरी ना मै कभी कर पता और ना ही कभी इस और कोशिश की। तो फिर अब और क्या??, इसी उधेड़बुन में दिल्ली चला आया की शायद विकल्पों के ढेर में मुझे अपने लिए भी कुछ मिल ही जाएगा,मगर ये फैसला ज़िन्दगी का सबसे नकारात्मक फैसला बनता जा रहा था मेरे लिए। यहाँ के लोग,यहाँ का समाज,इतना एकाकी,आस-पड़ोस का अपने पड़ोसियों से व्यव्हार जैसी चीज का अभाव,ये सब मुझे एक बार फिर व्याकुल कर रहा था। मैं वापस जाना चाहता था, वहीं जहाँ से कभी कोई सफ़र शुरु किया था, अपने मम्मी-पापा के पास,जाने क्यूँ मगर अब मुझे घर जैसे बुला रहा था। मैं घर गया,सोचा शायद कुछ दिनों का अपनों का साथ मुझे हौसला देगा,अपनी लड़ाई लड़ने को,उसे जीतने की,मगर वहां पहुंचकर एक निष्कर्ष निकाला- मैं अब दिल्ली नहीं रहूँगा,योजनायें बदल गयीं,विचार बदल गए ,हालांकि लक्ष्य वही था अभी तक।
इन तमाम समयाचाक्रों में कभी भी JNU में,अपने चयन को लेकर नहीं सोचा। कैसे सोचता?,जिस पेपर में देश भर से ग्रेजुएट अपने विषय को पढ़कर उस आधार पर प्रवेश परीक्षा देते हैं,उसमे कोई Non-Humanities Background का छात्र कैसे इतनी आसानी से जा सकता है,वो भी केवल एक NCERT की किताब पढ़कर, बस थोडा बहुत जो भरोसा था,वो अपनी लेखनी और अपने सामजिक विचारों का, मगर ये सब यकीन दिलाएं,ऐसा कुछ भी नहीं था।
19 की दोपहर के 12 बजे का समय, ट्रेन में था मैं,अपना इअरफोन लगाकर गाना सुन रहा था,तभी एक मैसेज आया, मैंने बटने दबायीं और मैसेज खुला-
Congratulation, You have been selected in JNU Entrance Examination 2013-14.
खुशियों का ज्वार जैसे दूर समुन्दर में मुझे अपनी ओर आता दिखा। और फिर, मैं ना जाने कितना खुश हुआ,बस जल्दी से घर पहुचने की देर, इन खुशियों को बाँटने की जल्द,और अपने अन्दर के ज्वार को फूट पाने से रोकने की जल्द, बस ऐसे ही एहसासों में चले जा रहा था,चले जा रहा था।
जाने कितने अरसों बाद एक मौका आया था, मम्मी-पापा को कुछ खुशियाँ देने का, वर्ना पढाई लिखाई के मामले में हिन्दुस्तान के करोड़ों बच्चों की तरह मैंने भी डांट ही खायी है। मगर आज तो समाचार कुछ और ही था,उम्मीदों से परे,सबसे अलग,मैंने अपने लिए नयी राह चुनी और मुझे फक्र है खुद पर और विश्वास है अपने भगवान् पर जो मुझे इतनी बड़ी यूनिवर्सिटी में मौका मिला पढने का,सीखने का,और एक नयी दुनिया में जीने का.…….
JNU में सफ़र की शुरुवात हो गयी,उम्मीद करता हूँ,यहाँ के तमाम संसाधनों का प्रयोग कर एक नयी इबारत लिखूंगा,
मेरे साथ बिताये पलों का आखिर क्या हिसाब करोगे?,
मुझ जैसा दोस्त पाने की खुदा से फ़रियाद करोगे,
मैं रहूँ या ना रहूँ तुम्हारे बीच कभी,
कुछ ऐसा कर जाऊँगा की ताउम्र याद करोगे।
इन तमाम समयाचाक्रों में कभी भी JNU में,अपने चयन को लेकर नहीं सोचा। कैसे सोचता?,जिस पेपर में देश भर से ग्रेजुएट अपने विषय को पढ़कर उस आधार पर प्रवेश परीक्षा देते हैं,उसमे कोई Non-Humanities Background का छात्र कैसे इतनी आसानी से जा सकता है,वो भी केवल एक NCERT की किताब पढ़कर, बस थोडा बहुत जो भरोसा था,वो अपनी लेखनी और अपने सामजिक विचारों का, मगर ये सब यकीन दिलाएं,ऐसा कुछ भी नहीं था।
19 की दोपहर के 12 बजे का समय, ट्रेन में था मैं,अपना इअरफोन लगाकर गाना सुन रहा था,तभी एक मैसेज आया, मैंने बटने दबायीं और मैसेज खुला-
Congratulation, You have been selected in JNU Entrance Examination 2013-14.
खुशियों का ज्वार जैसे दूर समुन्दर में मुझे अपनी ओर आता दिखा। और फिर, मैं ना जाने कितना खुश हुआ,बस जल्दी से घर पहुचने की देर, इन खुशियों को बाँटने की जल्द,और अपने अन्दर के ज्वार को फूट पाने से रोकने की जल्द, बस ऐसे ही एहसासों में चले जा रहा था,चले जा रहा था।
जाने कितने अरसों बाद एक मौका आया था, मम्मी-पापा को कुछ खुशियाँ देने का, वर्ना पढाई लिखाई के मामले में हिन्दुस्तान के करोड़ों बच्चों की तरह मैंने भी डांट ही खायी है। मगर आज तो समाचार कुछ और ही था,उम्मीदों से परे,सबसे अलग,मैंने अपने लिए नयी राह चुनी और मुझे फक्र है खुद पर और विश्वास है अपने भगवान् पर जो मुझे इतनी बड़ी यूनिवर्सिटी में मौका मिला पढने का,सीखने का,और एक नयी दुनिया में जीने का.…….
JNU में सफ़र की शुरुवात हो गयी,उम्मीद करता हूँ,यहाँ के तमाम संसाधनों का प्रयोग कर एक नयी इबारत लिखूंगा,
मेरे साथ बिताये पलों का आखिर क्या हिसाब करोगे?,
मुझ जैसा दोस्त पाने की खुदा से फ़रियाद करोगे,
मैं रहूँ या ना रहूँ तुम्हारे बीच कभी,
कुछ ऐसा कर जाऊँगा की ताउम्र याद करोगे।
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