Sunday, 6 April 2014

मेरी परेशानियां

जीवन में जब चाह बढ़ जाती है और फिर आपपर किसी किस्म का दबाव भी बनने लगता है तो वो परिस्तिथियाँ थोड़ी निराशा लाती हैं . हम हताश होते हैं, करना कुछ और चाहते हैं करते कुछ और हैं . जीवन इस दोराहे पर आके जाने क्यूँ भटक सा जाता है . वर्त्तमान में कुछ ऐसी ही स्थितियों से जूझ रहा हूँ और एकदम अनजान हूँ अपने आने वाले भविष्य को लेकर . पढना मेरा पुराना शौक रहा है, मगर एक चाह भी रही है की नौकरी करूँ और परिवार को सम्भालूँ, दोनों चीजें हो सकती हैं, मगर एक तीसरी चीज की चाह ने समीकरण को थोडा डांवाडोल कर दिया है फिलहाल तो . इस जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय के परिसर में आकर भी मैं यहाँ की सुविधाओं का वो इस्तेमाल नहीं कर पा रहा हूँ जैसा मैंने सोचा था .हालांकि यहाँ आकर मेरे सामने कई द्वन्द भी आये . भारतीय प्रशासनिक सेवा की तैयारी के उद्देश्य से यहाँ आया था मगर फिर लगा जैसे इन चीजों से ज्यादा बड़ा आपका अपना ज्ञान है जो यहाँ के REsources की मदद से मुझे मिल सकता है और फिर मेरे लिए वाकई प्रशासनिक सेवा का कोई ख़ास महत्व नहीं रह जाएगा . मगर पारिवारिक जिम्मेदारियों से भी मुह नहीं मोड़ा जा सकता और इंजीनियरिंग के समय का लोन भी चुकाना है, ऐसे में क्या करूँ यही इस दुविधा का विषय है . जिस माहौल में अभी रह रहा हूँ वहां होते हुए भी नहीं हूँ शायद और फिर ऐसे में एक और निराशा की मैं वाकई क्या कर रहा हूँ,?? ये बैंकिंग और सचिवालय की नौकरी क्या वाकई मेरे ज्ञान के चाह को बचा पाएगी, या फिर 9 से 5 की नौकरी में मेरा अपना वजूद कहीं खो न जाए . समाज सेवा का जो लक्ष्य मैंने एक लम्बी सोच के लिए सोच रखा है, उसके लिए भी क्या करूँ, ये समझ नहीं आता . पिछले कुछ दिनों से वाकई बहुत मानसिक दुविधा है, जीवन ऐसा भी हो जाएगा, ये नहीं सोचा था, फिर करूँ तो क्या ?????


No comments:

Post a Comment