Tuesday, 17 December 2013

निर्भया तुम्हे सलाम...



पूरे एक साल हो गए,इस सोते हुए समाज को एकाएक जगा देने वाली घटना को।  एक साल पहले ऐसे ही एक सुबह जब पेपर में ये घटना पढ़ी तो ना जाने क्यूँ वो लिखे शब्द संवेदनाओं के सबसे अंदरूनी स्तर को छू गये। सब कुछ इतना अमानवीय,इतना क्रूर।  कुछ तो था उस दिन उस समाचार में, जो बार बार मेरे रोंगटे खड़े कर दे रहा था। दोपहर से शाम होते-२ जब सीनियर्स और जूनियर्स से बातें हुई तब एहसास हुआ कि इस क्रूरता पर प्रतिक्रिया हर जगह एक जैसी थी। उस समय, उस सम्बन्ध में ज्यादा कुछ नहीं लिखा था। विचार शून्य थे और भावनाएं प्रबल थीं मगर इतना तो था कि उस घटना ने इस सो चुके तथाकथित सभ्य समाज की क्षीण हो चुकी इंसानियत को उजागर कर दिया। आज एक साल बाद जब इस JNU में आकर चीजों को समझ पाने कि क्षमता पहले से बढ़ी है, तब कहीं न कहीं इन होती आ रही घटनाओं का मूल नज़र आता है।
           सोचता हूँ उस माँ के बारे में,उस पिता के बारे में जो 16 दिसंबर आते ही शायद अजीब सी बेचैनी महसूस करने लगते होंगे। हंसना-रोना,सुख-दुःख,सब कुछ उनके लिए एकदम अजीब,जैसे हर किसी चीज से परे सब भावनाएं। मुझे लगता है,जैसे वो इस तारीख को अपनी ज़िन्दगी से हटा देना चाहते होंगे। 15 के बाद 17  दिसंबर, साल के 364 दिन, शायद यही होगी शेष ख्वाहिश।
                 वो मशाल जो ठीक एक साल पहले,इन्ही दिल्ली कि गलियों से,सड़कों से होकर देश के कोने कोने में जली, जिसके लिए लोग बड़ी संख्या में लड़े,वो कितना बदलाव लायी, ये अहम सवाल है। मैंने गौर किया कि जनवरी 2013 से पेपरों में रेप, बलात्कार,यौन-शोषण,छींटाकशी के केस एक बड़ी संख्या में ज़ाहिर हुए हैं जो हाल ही के आसाराम, तरुण तेजपाल और भारत के पूर्व सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश की करतूतों तक जारी है। कहने का अर्थ है-कि ये घटनाएं पहली भी होती थीं,मगर अब ज़ाहिर होने लगी हैं। लोगों में लड़ने का हौसला जगा है अब।  "समाज में बदनामी हॊगी " जैसे छद्म विचारों से ऊपर आकर आवाज़ उठाने कि ताकत आयी है। कुकर्मी छोटे से छोटा हो,या बड़े से बड़ा अब मायने नहीं रख रहे हैं। निर्भया जंग कि शायद यही सबसे बड़ी जीत है। मगर इस लड़ाई को बढ़ाने की ज़रुरत है,सामाजिक समानता सिर्फ कलमों और लेखों तक सीमित रखे जाने वाले शब्द नहीं . पितृ-सत्तात्मकता,अन्याय,सामाजिक बंधन-इन्हे मिटाने की ज़रुरत है। समय लगेगा,मगर हार नहीं माननी है,बदलाव धीरे ही सही-आना चाहिए,सही अर्थों में वही जीत होगी। खुद अच्छे बने रहना एकमात्र विकल्प नहीं,गलत को सुधारना भी होगा।  निर्भया तुम जहाँ कहीं भी होगी,इस बदलाव को देखकर शायद अपनी कुर्बानी को ज़ाया ना जाते देख खुश होगी।
तुम्हारे हर एक जज़बे को सलाम।


 नारी-मुक्ति ज़िंदाबाद
  निर्भया अमर रहे................


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