Wednesday, 25 December 2013

आम आदमी-नयी लड़ाई



दिल्ली की सड़कों पर  रौनक लौट आयी। दिन का सूरज  कुछ ज्यादा ही तेज़ था।  भाजपाई Frustation जायज है। पिछले कई सालों विपक्ष में बैठकर तो कुछ हुआ नहीं,और इस बार "लहरी बाबा " का थोडा बहुत असर (जो कि दिल्ली में कतई नहीं रहा ) महसूस किया,उसके दम पर "आम आदमी पार्टी के उठाये मुद्दों की विरासत " पर उसने "सत्ता" पाने जो ख्वाब देखा,तो उसी  आम आदमी ने उसे दरकिनार करते हुए अपनी सेवा खुद ही करने का विकल्प चुना। लोग कह रहे हैं कि भाजपा ने ३२ सीटों के बाद भी सत्ता हासिल नहीं की और वो इसे उसका बड़प्पन बताते  हैं,और वही लोग आम आदमी के पार्टी बना लेने पर बयानबाजी कर रहे हैं।  दो मुख्य सवाल हैं- क्या ये उनके लिए शर्म कि बात नहीं कि 15 साल से विपक्ष में बैठकर और उसके 15 साल पहले से राजनीति में आकर आप बहुमत भी नहीं बना पाये। जबकि आम आदमी पार्टी ने एक साल के इस समय में 28 सीटों पर अपना दावा दिखाया।  अगर यही जनता का फैसला है,तो इस फैसले के पीछे का इतिहास भी देखिये।  32,28 से ज्यादा ही है,मगर सच्चाई से तो आप भी वाकिफ हैं ना।
            दूसरी बात-अगर आप जनता के इतने बड़े हिमायती रहे तो अल्पमत में सरकार बनाने का दावा पेश क्यूँ नहीं किया। आप दावा पेश करते,फिर अगर कोई आपके विरोध में जाता तो वो सही मायनो में जनता के कोप का कारण बनने लायक होता। मगर आप इस उम्मीद में रहे कि जिम्मेदारी क्यूँ लें? कमियां निकालना आसान लगा भाजपाइयों को। फिर आपने "आप " पर दबाव बनाया कि वो जिम्मेदारी से भाग रही है,और जब लोकतंत्र में पहली बार "आप" ने जनमत संग्रह से फैसला लेने का ऐतिहासिक कदम उठाया तो आपको वो भी नौटंकी लगा। समस्या शायद यही है-कई सालों से ओछी राजनीती करते करते आपने दोनों को पर्याय मान लिया इसीलिए असली लोकतंत्र आपके लिए सिर्फ किताबी बातें और ज्ञान रहा।
 कांग्रेस के साथ "AAP" का गठबंधन नहीं हुआ है,ये सिर्फ मुद्दों को लेकर एक समर्थन है,और जिस शर्त की  बात  शीला दीक्षित ने की वो तो हर दिल्लीवासी चाहता है। वैसे भाजपा का गठबंधन को लेकर इतिहास भी कुछ बहुत अच्छा नहीं रहा है,भली-भाँती समझ रहे होंगे आप सब। कुछ लोग  तो "लहरी बाबा" के फेर में ऐसा पड़ गए हैं कि उनको उनमे भगवान् विष्णु का दसवां अवतार दिखने लगा है. जनता फिर भी धैर्य धरे है,वो इसलिए क्योकि जनता की ही तो सरकार बनने जा रही है . लोग इसे अपने-अपने तरह से विश्लेषित भी कर रहे हैं. अब क्या करें,हर तरह का जोड़-तोड़ भी ज़रूरी है. साहित्य की एक बड़ी विशेषता है-चीजों को जैसा चाहो,वैसा दिखा दो,बस शब्दों के हेर-फेर से।  वैसे भी बचपन की कहावत है-बात और हल्दी कहीं भी लग जाते हैं.
         खैर अब आगे की बात- राजनीतिक घोषणापत्र को पूरा करने के लिए पूरे 5 साल दिए जाते हैं,मगर भाजपा तो उत्तेजना के चरम पर जाकर चाह रही है कि सभी काम 5 दिन में हों। इसी उत्तेजना में सामजिक समझ भी ख़तम कर ली क्या? कुछ लोग तो इस कदर कुतर्क कर रहे हैं कि केजरीवाल के आने से काम के घंटे 6 7 तो होंगे नहीं, हद है यार। अब कहो तो केजरीवाल आपके बच्चों कि देखभाल भी कर लें। केजरीवाल हॉग्वर्ट्ज़ स्कूल के हैरी पॉटर तो नहीं न,जो झाड़ू पर उड़कर,छड़ी घुमाकर सारा देश बदल दें,मगर हाँ-जिस लोकतंत्र को सुचारु रूप से क्रियान्वित करने ख्वाब आम आदमी ने देखा,वो देश की ज़रुरत है।
काम तो हमारे देश में अभी "प्रथम पंचवर्षीय योजना " का भी पूरा नहीं हो पाया,उसका क्या? फिर सारा आरोप-प्रत्यारोप AAP पर ही क्यूँ? बिजली के दाम अगर २०-३० % भी कम हुए तो क्या ये उपलब्धि नहीं। और फिर उनसे पूछिए जो 30% का बोलकर भी आने में डर गए। योजनाओं का असर दिखने में समय लगता है,बस समय कि प्रतीक्षा कीजिये। वैसे भी दिल्ली में पिछले एक साल में कितना कुछ तो बदल गया है।

"आम आदमी " सोशल नेटवर्किंग पर भाड़े के टट्टू बिठाकर दिन भर अपना प्रचार तो नहीं करता मगर कभी कभी कुछ लोगों को जवाब देने का मन कर ही जाता है। और फिर समय और जनता से बलवान कोई नहीं-मौक़ा आने दीजिये, बस एक बटन दबाकर वो आइना दिखायेगी। ………

Tuesday, 17 December 2013

निर्भया तुम्हे सलाम...



पूरे एक साल हो गए,इस सोते हुए समाज को एकाएक जगा देने वाली घटना को।  एक साल पहले ऐसे ही एक सुबह जब पेपर में ये घटना पढ़ी तो ना जाने क्यूँ वो लिखे शब्द संवेदनाओं के सबसे अंदरूनी स्तर को छू गये। सब कुछ इतना अमानवीय,इतना क्रूर।  कुछ तो था उस दिन उस समाचार में, जो बार बार मेरे रोंगटे खड़े कर दे रहा था। दोपहर से शाम होते-२ जब सीनियर्स और जूनियर्स से बातें हुई तब एहसास हुआ कि इस क्रूरता पर प्रतिक्रिया हर जगह एक जैसी थी। उस समय, उस सम्बन्ध में ज्यादा कुछ नहीं लिखा था। विचार शून्य थे और भावनाएं प्रबल थीं मगर इतना तो था कि उस घटना ने इस सो चुके तथाकथित सभ्य समाज की क्षीण हो चुकी इंसानियत को उजागर कर दिया। आज एक साल बाद जब इस JNU में आकर चीजों को समझ पाने कि क्षमता पहले से बढ़ी है, तब कहीं न कहीं इन होती आ रही घटनाओं का मूल नज़र आता है।
           सोचता हूँ उस माँ के बारे में,उस पिता के बारे में जो 16 दिसंबर आते ही शायद अजीब सी बेचैनी महसूस करने लगते होंगे। हंसना-रोना,सुख-दुःख,सब कुछ उनके लिए एकदम अजीब,जैसे हर किसी चीज से परे सब भावनाएं। मुझे लगता है,जैसे वो इस तारीख को अपनी ज़िन्दगी से हटा देना चाहते होंगे। 15 के बाद 17  दिसंबर, साल के 364 दिन, शायद यही होगी शेष ख्वाहिश।
                 वो मशाल जो ठीक एक साल पहले,इन्ही दिल्ली कि गलियों से,सड़कों से होकर देश के कोने कोने में जली, जिसके लिए लोग बड़ी संख्या में लड़े,वो कितना बदलाव लायी, ये अहम सवाल है। मैंने गौर किया कि जनवरी 2013 से पेपरों में रेप, बलात्कार,यौन-शोषण,छींटाकशी के केस एक बड़ी संख्या में ज़ाहिर हुए हैं जो हाल ही के आसाराम, तरुण तेजपाल और भारत के पूर्व सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश की करतूतों तक जारी है। कहने का अर्थ है-कि ये घटनाएं पहली भी होती थीं,मगर अब ज़ाहिर होने लगी हैं। लोगों में लड़ने का हौसला जगा है अब।  "समाज में बदनामी हॊगी " जैसे छद्म विचारों से ऊपर आकर आवाज़ उठाने कि ताकत आयी है। कुकर्मी छोटे से छोटा हो,या बड़े से बड़ा अब मायने नहीं रख रहे हैं। निर्भया जंग कि शायद यही सबसे बड़ी जीत है। मगर इस लड़ाई को बढ़ाने की ज़रुरत है,सामाजिक समानता सिर्फ कलमों और लेखों तक सीमित रखे जाने वाले शब्द नहीं . पितृ-सत्तात्मकता,अन्याय,सामाजिक बंधन-इन्हे मिटाने की ज़रुरत है। समय लगेगा,मगर हार नहीं माननी है,बदलाव धीरे ही सही-आना चाहिए,सही अर्थों में वही जीत होगी। खुद अच्छे बने रहना एकमात्र विकल्प नहीं,गलत को सुधारना भी होगा।  निर्भया तुम जहाँ कहीं भी होगी,इस बदलाव को देखकर शायद अपनी कुर्बानी को ज़ाया ना जाते देख खुश होगी।
तुम्हारे हर एक जज़बे को सलाम।


 नारी-मुक्ति ज़िंदाबाद
  निर्भया अमर रहे................